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कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखक का स्थान नही ले सकती-डॉ श्रीगोपाल नारसन 

Byadmin

Feb 20, 2026
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अंतरराष्ट्रीय ई-सेमिनार –
रुड़की-श्रीसद्गुरु गंगावीर महाराज साइंस,आर्ट्स व कॉमर्स कालेज कॉपरगांव महाराष्ट्र द्वारा साहित्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्भावनाएं व चुनोतियाँ विषय पर अंतरराष्ट्रीय ई-सेमिनार में मुख्य वक्ता के रुप मे विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के उपकुलपति एवं उत्तराखंड के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ श्रीगोपाल नारसन ने कहा कि साहित्य में एआई  का महत्व रचनात्मकता को बढ़ाने, लेखन प्रक्रिया को तेज करने और जटिल डेटा का विश्लेषण करने में एक क्रांतिकारी सहायक के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि यह लेखकों को कथानक, संवाद और विचारों को विकसित करने में मदद करता है। इसके अलावा, एआई का उपयोग पुराने साहित्य के अनुवाद, संरक्षण और विस्तृत साहित्यिक समीक्षा में हो रहा है। एआई के प्रभाव स्वरूप भाषा और साहित्य में बदलाव द्वारा साहित्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहा है।श्रीगोपाल नारसन का मानना है कि हम
एआई के द्वारा नए विचारों का सृजन कर सकते हैं, और कहानी,गद्य व पद्य के विभिन्न पहलुओं को बेहतर बना सकते हैं। एआई पुराने और दुर्लभ ग्रंथों का आधुनिक भाषाओं में अनुवाद कर सकता है, जिससे उनकी पहुंच वैश्विक स्तर तक होती है।
वही साहित्यिक प्रवृत्तियों की भविष्यवाणी करने, शैली का विश्लेषण करने और पात्रों के विकास को समझने में भी मदद मिलती हैं।यह दौर तकनीक द्वारा भाषाई संरक्षण और साहित्य की आत्मा बचाने की एक बड़ी चुनौती है।समय के साथ ज्ञान का रूप बदला, माध्यम बदला, लेकिन उसका मूल भाव बना रहा। वेदों की मौखिक परंपरा से लेकर ताड़पत्रों और भोजपत्रों तक, फिर हस्तलिखित पांडुलिपियों से छपाई की मशीन तक और अब डिजिटल दुनिया तक, भारतीय साहित्य ने हर बदलाव को अपनाया।अब एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दौर सामने है।साहित्यकार श्रीगोपाल नारसन ने स्पष्ट किया कि लेखक की जगह मशीन नही ले सकती है , मशीन लेखक की सहयोगी भर है।लेकिन फिर भी एआई एक उम्मीद कारास्ता खोलता है। क्योंकि साहित्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।इस अंतरराष्ट्रीय ई सेमिनार में
सतारा से डॉ शिवलिंग मेनकुड़ेले,नीदरलैंड से भास्कर हांडे,कोलकाता से डॉ जयदीप सारंगी,भागीरथ शिंदे व प्राचार्य डॉ एम टी सरोडे ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को 21 वीं सदी में वरदान बताया, जिसके सदुपयोग से साहित्य उन्नत हो सकता है।

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